सफलता का मंत्र

सुप्रसिद्ध पत्रकार कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर किसी कार्यवश दिल्ली गए थे। वहां उनकी भेंट मालवीय जी से हो गई। बातों का क्रम चल निकला। अचानक मालवीय जी ने घड़ी देखी, वह हड़बड़ाहट से भर कर बोले, ‘मुझे तो इस गाड़ी से मथुरा जाना है।

’ जल्दी-जल्दी कपड़े पहनते हुए उन्होंने अपने सेवक से कहा, ‘सामान मोटर में रखो।’ सेवक ने भी अपनी घड़ी देखी। कहा, ‘महाराज गाड़ी नहीं मिल सकती। उसे दिल्ली स्टेशन छोड़े काफी समय हो चुका है।

’ न घबराहट, न बेचैनी। शांत भाव से मालवीय जी ने सामान मोटर में रखवाया और चल पड़े। गाड़ी लेट थी। मालवीय जी गाड़ी में जा बैठे और मिश्रजी बाहर खड़े रहे। उनसे मालवीय जी ने कहा, ‘तो एक सूत्र लिख लो।

’ मिश्रजी ने अपनी डायरी निकाली तो वह बोले, ‘जब तक असफलता बिल्कुल छाती पर न सवार हो बैठे, दम न घोट डाले, असफलता को स्वीकार मत करो।’ यह सुनकर मिश्रजी अनायास बोल पड़े, ‘और सफलता के लिए निरंतर उद्योगरत रहो।’ मालवीय जी ने प्रसन्न होकर कहा, ‘बस, तुम ठीक समझे।’

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