प्रभु की संपत्ति
वेदव्यास जी अपने शिष्यों को धन, संपत्ति, तथा शरीर के प्रति मोह त्याग कर सर्वस्व भगवान को समर्पित करने का उपदेश दे रहे थे। एक शिष्य ने कहा, ‘महाराज कलियुग को ‘अर्थ प्रधान युग’ कहा गया है।
ऐसी स्थिति में धन-संपत्ति का पूरी तरह त्याग कैसे संभव हो पाएगा?’ व्यास जी ने कहा, ‘यदि मानव धन-संपत्ति पूरी तरह नहीं त्याग सकता तो उसे भगवान के समक्ष ‘तेन-त्यक्तेन भुंजीथा’ कहकर उसे ईश्वर को समर्पित तो कर सकता है।
भगवान के समक्ष समर्पण के बाद उस धन-संपत्ति का मनमाने ढंग से उपयोग करने में वह अवश्य हिचकिचाएगा। समर्पण करने वाला मनुष्य उस धन-संपत्ति का अपने जीवनयापन पर उचित उपयोग करने के बाद कुछ न कुछ अंश सत्कार्यों पर, सेवा-परोपकार पर अवश्य खर्च करेगा। अत: हमें अपने को संपत्ति का स्वामी न मानकर उसे भगवान की संपत्ति मानना चाहिए।’