सच्चाई का आईना
एक बार शहर के कुछ कवियों ने मिलकर काव्य गोष्ठी का आयोजन किया। कुछ कवियों ने अपने राजा के निरंकुश कर्मों का अपनी कविताओं में बखान किया। गुप्तचरों द्वारा यह बात राजा को पता चल गई। राजा यह सब सुनते ही आगबबूला हो गया और सभी कवियों को पकड़ कर राजदरबार में लाने का आदेश दे दिया।
राजा ने एक-एक कर सभी कवियों को कविता सुनाने का आदेश दिया। सभी कवियों ने बारी-बारी से राजा की प्रशंसा में कविताएं पढ़ीं और राजा खुश होकर उनको मुक्त करता गया। परंतु एक कवि चुपचाप खड़ा रहा और उसने राजा की प्रशंसा में कविता पाठ करने से मना कर दिया। राजा ने अपने सिपाही से कहा, ‘खम्भे से बांधकर इस पर तब तक कोड़े बरसाते रहो, जब तक यह कविता न कहे।’
राजा के हुक्म का पालन किया गया। जैसे ही पहले कोड़े ने कवि के शरीर पर आघात किया, कवि ने राजा की निरंकुशता पर कविता पढ़नी शुरू कर दी। अब राजा क्रोध से आगबबूला हो गया और कवि को मृत्युदण्ड का आदेश दे दिया। इतने में दरबार में उपस्थित वयोवृद्ध महामंत्री उठ खड़े हुए और बोले, ‘हे राजन! इस कवि की कविता आम आदमी की आवाज है।
तुम सौभाग्यशाली हो कि तुम्हारे राज्य में तुम्हें तुम्हारा असली आईना दिखाने वाला एक निर्भीक और ईमानदार कवि मिला। बाकी छोड़े गए सभी कवि डरपोक और चाटुकार निकले। इस कवि को मुक्त कर दो।’ राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने कवि को अपना राजकवि बना दिया।