माली में सेना की हिरासत में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री
नई दिल्ली: माली सोमवार को एक बार फिर उस समय संकट में आ घिरा जब सेना के अधिकारियों ने अंतरिम राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री को हिरासत में ले लिया। इससे पिछले साल हुए तख्तापलट के बाद सिविलियन सरकार के हाथों में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया बाधित हुई है। पश्चिमी अफ्रीकी देश में ताजा घटनाक्रम से स्थिरता की आंशका बढ़ गई है, जहां अलकायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे हिंसक इस्लामिक समूहों ने उत्तर और मध्य भाग में बड़े इलाके पर नियंत्रण जमा रखा है। आइए जानते हैं कि संकट की शुरुआत कैसे हुई और इससे क्या खतरे पैदा होंगे। माली में विद्रोही सैनिकों ने देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सोमवार को गिरफ्तार कर लिया। घटना के कुछ ही घंटों पहले सरकार में फेरबदल किया गया था और सेना के दो सदस्यों को सरकार में शामिल नहीं किया गया था। राष्ट्रपति बाह एन’डॉव, प्रधानमंत्री मोक्टर ओउने और रक्षा मंत्री सोलेमाने डोकोर ने राजधानी बमाको के बाहर एक सैन्य बेस पर ले जाया गया है। माली में 9 महीने पहले सेना ने सैन्य तख्तापलट करके सत्ता अपने हाथ में ले ली थी। पिछले साल राष्ट्रपति इब्राहिम बूबाकर केइता को सत्ता से हटाने के बाद सेना ने सितंबर में रिटायर्ड कर्नल बाह एन’डॉव को अंतरिम राष्ट्रपति बनाया था।
सेना की मंशा अभी पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब पिछले साल हुए तख्तापलट के बाद रक्षामंत्री और सुरक्षा मंत्री बनाए गए सादियो कामारा और मोदिबो कोने को फेरबदल के बाद कैबिनेट से बाहर कर दिया गया। माली सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कामरा और कोने को बाहर करने का फैसला गलत साबित हुआ है और संभवत: सेना ने दोनों को पद वापस दिलाने के लिए ताकत दिखाई है। संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय यूनियन और अन्य देशों ने हिरासत में लिए गए नेताओं की तुरंत रिहाई की मांग की है। पश्चिमी अफ्रीकी देशों (ECOWAS) का प्रतिनिधिमंडल सक्रिय हो गया है, जिसने पिछले साल अगस्त में तख्तापलट के बाद सेना से बातचीत की थी। पश्चिम अफ्रीकी क्षेत्रीय खंड (ईसीओडब्ल्यूएएस) और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के अन्य सदस्यों ने एक संयुक्त बयान जारी कर राष्ट्रपति बाह एन’डॉव और प्रधानमंत्री मोक्टर ओउने को तुरंत रिहा करने की मांग की है। ईयू के टॉप डिप्लोमैट जोसेफ बोरेल ने कहा कि सत्ता परिवर्तन के रास्ते में आने वालों पर प्रतिबंध लगाए जाएंगे। इस घटनाक्रम से एक नई चिंता उभर कर सामने आई है कि क्या मौजूदा सरकार स्वतंत्र रूप से भविष्य में काम कर पाएगी और अगले साल फरवरी में माली में तय लोकतांत्रिक चुनाव को आयोजित कराने की योजना को आगे बढ़ा पाएगी?