बैंकों और क्रिप्टोकरेंसी कंपनियों में पैसों को लेकर छिड़ी आर-पार की लड़ाई!

अमेरिका में क्रिप्टोकरेंसी के नियमन (Cryptocurrency Regulation) को लेकर एक बड़ा कदम उठाया जा रहा है। लंबे समय से लटके क्लैरिटी एक्ट (CLARITY Act) को अगले हफ्ते सीनेटरों के सामने विचार के लिए पेश किया जाएगा। यदि यह कानून बन जाता है, तो यह तेजी से बढ़ते डिजिटल एसेट सेक्टर के लिए स्पष्ट नियामक नियम लाएगा और क्रिप्टोकरेंसी कंपनियों तथा बैंकिंग उद्योग के बीच चल रहे लंबे गतिरोध को खत्म कर सकता है। सीनेट बैंकिंग कमेटी के चेयरमैन टिम स्कॉट ने बताया कि इस महत्वपूर्ण बिल पर 14 मई को वाशिंगटन डी.सी. के डर्कसेन सीनेट कार्यालय भवन में एक अहम बैठक होगी।

क्रिप्टो इंडस्ट्री के लिए क्या तय करेगा CLARITY Act?
यह बिल डिजिटल संपत्तियों के लिए स्पष्ट नियामक दिशानिर्देश स्थापित करने का लक्ष्य रखता है। इसके तहत मुख्य रूप से स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाएगा कि कौन सी क्रिप्टो संपत्तियां ‘प्रतिभूति’ (Securities) की श्रेणी में आती हैं और कौन सी ‘वस्तु’ की श्रेणी में हैं।

इसके अलावा इन डिजिटल एसेट्स की निगरानी और नियमन कौन सी सरकारी एजेंसी करेगी, क्रिप्टो एक्सचेंज, ब्रोकर और डीलर के काम करने के नियम क्या होंगे और ग्राहकों की सुरक्षा (Consumer Protection) के लिए किन कड़े मानकों का पालन करना अनिवार्य होगा शामिल हैं।

क्रिप्टो उद्योग लंबे समय से इस कानून की मांग कर रहा है, क्योंकि उनका मानना है कि अमेरिका में डिजिटल एसेट्स के भविष्य और क्रिप्टो कंपनियों की बुनियादी समस्याओं को सुलझाने के लिए यह बेहद जरूरी है।

स्टेबलकॉइन्स के इस्तेमाल पर क्या कहता है नया कानून?
यह बिल क्रिप्टो फर्मों और पारंपरिक बैंकों के बीच ‘स्टेबलकॉइन्स’ (अमेरिकी डॉलर से जुड़े डिजिटल टोकन) को लेकर चल रहे बढ़ते टकराव को भी सुलझाने का प्रयास करता है। रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस और डेमोक्रेटिक सीनेटर एंजेला आल्सोब्रूक्स के बीच हुए एक समझौते के तहत, अब क्रिप्टो कंपनियों को ग्राहकों को केवल उनके अकाउंट में स्टेबलकॉइन ‘होल्ड’ करने (यानी सिर्फ रखने) पर ब्याज या रिवॉर्ड देने की अनुमति नहीं होगी। ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि यह सुविधा पारंपरिक बैंक जमा (Bank Deposits) के बहुत करीब आ जाती है। हालांकि, स्टेबलकॉइन्स से जुड़ी अन्य गतिविधियों, जैसे- पेमेंट भेजने या ट्रांसफर करने पर रिवॉर्ड देने की पूरी छूट होगी।

आपके डिजिटल वॉलेट पर इसका क्या होगा असर?
आम क्रिप्टो वॉलेट यूज़र्स के लिए ‘CLARITY Act’ का सीधा मतलब यह है कि अब आपको केवल अपने वॉलेट में स्टेबलकॉइन्स को पड़े रहने देने पर कोई पैसिव ब्याज नहीं मिलेगा। हालांकि, पेमेंट करने, पैसे ट्रांसफर करने और ब्लॉकचेन से जुड़ी अन्य गतिविधियों पर मिलने वाले कैशबैक या रिवॉर्ड पहले की तरह ही जारी रहेंगे।

रिवॉर्ड पॉलिसी पर क्रिप्टो फर्म और बैंक क्यों हैं आमने-सामने?
बैंकिंग समूह स्टेबलकॉइन पर रिवॉर्ड देने की नीति का कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि यह नीति क्रिप्टो कंपनियों को बहुत अधिक आजादी देती है, जिससे लोग अपना पैसा पारंपरिक सुरक्षित बैंकों से निकालकर स्टेबलकॉइन्स में जमा करने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। दूसरी ओर, क्रिप्टो कंपनियों का कहना है कि थर्ड-पार्टी (जैसे क्रिप्टो एक्सचेंज) को स्टेबलकॉइन्स पर ब्याज देने से रोकना पूरी तरह से प्रतिस्पर्धा के खिलाफ है। कॉइनबेस (Coinbase) के मुख्य कानूनी अधिकारी पॉल ग्रेवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर बैंकिंग लॉबी की आलोचना करते हुए लिखा कि यह बदलाव केवल प्रतिस्पर्धा को “खत्म करने” के लिए डिजाइन किया गया है।

इस विवाद पर सीनेटरों का क्या रुख है?
सीनेटर एंजेला आल्सोब्रूक्स और थॉम टिलिस ने एक संयुक्त बयान जारी कर स्पष्ट किया है कि वे इस बिल पर बैंकिंग लॉबी के रुख से सहमत नहीं हैं। दोनों सीनेटरों ने कहा, “हमारा समझौता क्रिप्टो कंपनियों को ग्राहकों को अन्य प्रकार के रिवॉर्ड देने की अनुमति देता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह ‘CLARITY Act’ को द्विदलीय समर्थन के साथ पास करने का रास्ता साफ करता है, जो इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है। बैंकिंग उद्योग के कुछ लोग भले ही ऐसा न चाहते हों, लेकिन हम सम्मानपूर्वक उनसे असहमत हैं।”

अमेरिकी क्लैरिटी एक्ट का सीधा असर भारत के कानूनों पर नहीं पड़ेगा, लेकिन अमेरिका के ग्लोबल क्रिप्टो मार्केट पर दबदबे के कारण भारतीय निवेशकों पर इसका बड़ा अप्रत्यक्ष असर पड़ना तय है। भारतीय निवेशक अक्सर मार्केट की गिरावट से बचने के लिए अपने फंड को USDT या USDC जैसे स्टेबलकॉइन्स में रखते हैं और उन्हें विदेशी एक्सचेंजों (जैसे Binance, KuCoin) पर ‘स्टेक’ करके पैसिव इनकम या ब्याज (Yield) कमाते हैं।

इस कानून से भारतीय निवेशकों पर क्या असर?
अगर अमेरिकी कानून के तहत स्टेबलकॉइन जारी करने वालों और एक्सचेंजों को सिर्फ होल्डिंग पर ब्याज देने से रोक दिया जाता है, तो ग्लोबल प्लेटफॉर्म्स को अपनी पॉलिसी बदलनी पड़ेगी। इसका सीधा असर यह होगा कि भारतीय निवेशकों को भी स्टेबलकॉइन पर मिलने वाला 5% से 10% तक का सालाना ब्याज मिलना बंद या बहुत कम हो सकता है।

स्टेबलकॉइन क्या है?
स्टेबलकॉइन (Stablecoin) एक खास तरह की क्रिप्टोकरेंसी है, जिसे इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि उसकी कीमत हमेशा स्थिर (Stable) रहे। आम क्रिप्टोकरेंसी जैसे बिटकॉइन (Bitcoin) या इथेरियम (Ethereum) की कीमतों में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव (Volatility) होता है। एक ही दिन में इनकी कीमत 10-20% तक ऊपर या नीचे जा सकती है। इसी अस्थिरता से बचने के लिए स्टेबलकॉइन बनाए गए हैं।

अगर आप 100 डॉलर का स्टेबलकॉइन खरीदते हैं, तो उसकी कीमत हमेशा 100 डॉलर के आसपास ही रहेगी चाहे पूरा क्रिप्टो मार्केट गिर जाए या उठ जाए। Tether (USDT) दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे लोकप्रिय स्टेबलकॉइन है। वहीं USD Coin (USDC) को काफी सुरक्षित और पारदर्शी माना जाता है। यह किसी बैंक में रखे डॉलर के बजाय अन्य क्रिप्टो एसेट्स द्वारा बैक किया गया एक डीसेंट्रलाइज्ड स्टेबलकॉइन है।

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