धन का सदुपयोग

रामकृष्ण परमहंस से प्रेरणा लेकर दुर्गाचरण नाग गरीबों की सेवा में लगे रहते थे। स्वाध्याय और पूजा के साथ ही होम्योपैथी के माध्यम से वे गरीबों का इलाज भी करते थे।

एक दिन बड़े सम्पन्न परिवार की एक महिला उनके पास इलाज के लिए आई और एक सप्ताह के इलाज से ही रोगमुक्त हो गई। कृतज्ञ महिला डॉ. दुर्गाचरण नाग के पास पहुंची और रुपयों की गड्डी उनके सामने रखकर बोली, ‘डॉ. साहब, मेरी यह तुच्छ भेंट स्वीकार कीजिए।

’ डॉ. नाग ने वह रुपयों की गड्डी लौटाते हुए कहा, ‘बहन, मैंने दवाई की कीमत के चौदह रुपये और अपनी फीस के पांच रुपये आपसे ले लिये हैं। अपने हक़ से ज्यादा अनुचित धन लेना तो पाप है।

’ महिला की ज़िद पर डॉ. नाग बोले, ‘इस धन को आप सामने की बस्ती के गरीबों के लिए औषधालय बनाने में लगा दें तो आपको पुण्य मिलेगा।’

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