कोरोना संकट: सुप्रीम कोर्ट ने जैन समाज के तीन मंदिरों को सशर्त पर्युषण पूजा करने की इजाजत दी

सुप्रीम कोर्ट ने जैन समाज के तीन मंदिरों को सशर्त खोलने और पर्युषण पूजा करने की इजाजत दे दी है. शुक्रवार को सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) एसए बोबड़े ने कहा कि हम दादर, बायकुला और चेंबूर में स्थित जैन समाज के मंदिर को खोलने और पर्युषण पूजा की इजाजत देते हैं.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अन्य किसी मंदिर को पूजा या किसी कार्यक्रम के आयोजन की इजाजत नहीं दी जाएगी. जैन मंदिर में पूजा की इजाजत को गणपति उत्सव या अन्य किसी धार्मिक समारोह के आयोजन के लिए इजाजत मांगने का आधार नहीं बनाया जाएगा.

सीजेआई एसए बोबड़े ने कहा कि गणपति उत्सव पर स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी समयानुसार फैसला लेगी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारा विचार है कि यदि याचिकाकर्ता ईमानदारी से कोरोना नियमों का अनुपालन करेगा तो तीन मंदिरों (दादर, बायकुला और चेंबूर) में पूजा की अनुमति देना खतरनाक नहीं होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि हमें यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस मामले में हमारा आदेश याचिकाकर्ता ट्रस्ट से संबंधित दादर, बाइकुला और चेंबूर के तीन मंदिरों में दी जाने वाली प्रार्थनाओं तक ही सीमित है और किसी अन्य ट्रस्ट या किसी अन्य मंदिर तक नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारा आदेश किसी अन्य मामले में लागू करने का इरादा नहीं है, खासकर यदि इसमें लोगों की बड़ी मंडलियां शामिल हैं, जिसे मंदिर प्रबंधन नियंत्रित नहीं कर सकता है. हम मुंबई और अन्य स्थानों में गणेश उत्सव के दौरान होने वाली पूजा का विशेष रूप से उल्लेख कर रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर प्रबंधन को कहा कि वो अंडरटेकिंग दें कि कोरोना को लेकर SoP और सरकार की गाइडलाइन का पालन करेंगे. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार पर सवाल उठाए और कहा कि सरकार ने मॉल्स और अन्य आर्थिक गतिविधियों को खोलने की अनुमति दी है, लेकिन मंदिरों की नहीं.

सीजेआई एसए बोबड़े ने कहा कि यह एक गतिशील स्थिति है और यह वास्तव में गंभीर मामला है. यदि आप SOP को लागू कर सकते हैं और सभी सुरक्षा उपायों का पालन कर रहे हैं तो गतिविधियां क्यों नहीं होनी चाहिए? हम इसे प्रतिकूल मुकदमेबाजी नहीं मान रहे हैं. विचार समुदाय के लोगों की मदद करना है.

सीजेआई एसए बोबड़े ने कहा कियदि एक मंदिर में एक समय में पांच लोगों की बात होती है और सभी जगहों पर इस प्रारूप को दोहराया जा सकता है, तो हम जैन मंदिरों से परे इस दायरे का विस्तार करने के विरोध में नहीं हैं. हिंदू मंदिर क्यों नहीं, क्यों मुस्लिम धार्मिक स्थल क्यों नहीं ?

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