अमेरिकी पर्वतारोही टायलर एंड्रयूज ने 10 घंटे से भी कम समय में फतह किया माउंट एवरेस्ट, रचा इतिहास

बचपन में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को मात देने वाले 36 वर्षीय अमेरिकी एथलीट टायलर एंड्रूज़ ने माउंट एवरेस्ट पर वो कर दिखाया है, जो आज तक कोई भी विदेशी पर्वतारोही नहीं कर पाया था।

टायलर ने नेपाल की तरफ स्थित साउथ बेस कैंप से दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक की चढ़ाई महज 9 घंटे 55 मिनट में पूरी करके एक नया स्पीड रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है।

टूटा दो दशक पुराना ऐतिहासिक रिकॉर्ड

टायलर एंड्रूज ने अपनी इस जादुई चढ़ाई से नेपाली पर्वतारोही ल्हाकपा गेलू शेरपा के 23 साल पुराने रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया है। ल्हाकपा गेलू ने साल 2003 में 10 घंटे 56 मिनट का समय लिया था। पिछले दो दशकों से यह रिकॉर्ड अजेय बना हुआ था, लेकिन टायलर की रफ्तार के आगे यह टिक नहीं सका।

नेपाल की तरफ से एवरेस्ट पर सबसे तेज चढ़ाई के अब तक के सारे रिकॉर्ड सिर्फ शेरपा समुदाय के नाम ही थे। किलियन जोर्नेट जैसे जिन अन्य विदेशी एथलीटों ने स्पीड रिकॉर्ड बनाए भी, तो उन्होंने तिब्बत वाले रास्ते का इस्तेमाल किया था। ऐसे में नेपाल के कठिन रास्ते से यह कामयाबी हासिल करने वाले टायलर पहले गैर-शेरपा बन गए हैं।

साउथ साइड से चोटी तक पहुंचने की सबसे तेज रफ्तार

पर्वतारोही का नामसमयवर्ष
टायलर एंड्रूज़ (अमेरिका)9 घंटे 55 मिनट2026
ल्हाकपा गेलू शेरपा (नेपाल)10 घंटे 56 मिनट2003
पेम्बा दोरजे शेरपा (नेपाल)12 घंटे 45 मिनट2003
फुंजो झांगमू लामा (नेपाल)14 घंटे 31 मिनट (महिला रिकॉर्ड)2024
बाबू चिरी शेरपा (नेपाल)16 घंटे 56 मिनट2000
काजी शेरपा (नेपाल)20 घंटे 24 मिनट (बिना ऑक्सीजन)1998

रात के अंधेरे में डेथ जोन को चीरती रफ्तार

जहां आम पर्वतारोहियों को पहाड़ों के ऊंचे और कम ऑक्सीजन वाले माहौल में खुद को ढालने में हफ्तों का समय लगता है और वे बेस कैंप से शिखर तक की दूरी 4 से 7 दिनों में तय करते हैं, वहीं टायलर ने इसे एक ही रात में मुमकिन कर दिखाया।

टायलर ने बुधवार शाम 7:11 बजे अपनी चढ़ाई शुरू की, ठीक उसी समय जब खतरनाक खुंबू आइसफॉल पर अंधेरा घिरने लगा था। पूरी रात बिना रुके उन्होंने खुंबू आइसफॉल, वेस्टर्न कूम, ल्होत्से फेस और साउथ कोल के ऊपर स्थित जानलेवा डेथ जोन को पार किया।

उन्होंने रात भर में 14 किलोमीटर की दूरी तय की और 3,500 मीटर की सीधी वर्टिकल ऊंचाई चढ़कर गुरुवार सुबह 5:06 बजे तिरंगे और अमेरिकी ध्वज के साथ एवरेस्ट के शिखर पर कदम रख दिया।

पांचवें प्रयास में मिली कामयाबी

यह ऐतिहासिक कामयाबी इतनी आसान नहीं थी। टायलर पिछले दो पर्वतारोहण सीजन में चार बार नाकाम हो चुके थे। कभी खराब मौसम, कभी हिमस्खलन का खतरा तो कभी बहुत ज्यादा ऊंचाई पर उपकरणों की खराबी उनकी राह का रोड़ा बनी। पिछले साल तो कैंप III के पास उनके जूते में खराबी आ गई थी, जिसके कारण ठंड से अंग सुन्न होने के डर से उन्हें वापस लौटना पड़ा था।

सबसे बड़ा झटका उन्हें एक हफ्ते पहले ही लगा था, जब वे बिना ऑक्सीजन के सबसे तेज चढ़ाई का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने निकले थे। लेकिन बर्फीली हवाओं और तबीयत बिगड़ने के कारण उन्हें आपातकालीन ऑक्सीजन लेनी पड़ी और कैंप II से हेलीकॉप्टर के जरिए रेस्क्यू करना पड़ा।

टायलर ने अपने इंस्टाग्राम पर लिखा था कि मुझे शारीरिक थकान से ज्यादा इस बात का तनाव रहता है कि पहाड़ पर कोई छोटी सी अजीब चीज, जिसका मेरी फिटनेस से कोई लेना-देना नहीं है, मेरी सालों की मेहनत पर पानी फेर सकती है।

लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। बेस कैंप लौटकर कुछ दिन आराम किया और अपनी रणनीति बदलते हुए इस बार ‘ऑक्सीजन सपोर्ट’ के साथ आखिरी बार दांव खेलने का फैसला किया।

कैसी थी टायलर की अनूठी रणनीति?

भले ही टायलर ऑक्सीजन-सहायता प्राप्त श्रेणी में चढ़ रहे थे, लेकिन उनकी चढ़ाई का तरीका बेहद अनोखा था। टायलर ने लगभग 6,750 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कैंप II तक पहुंचने से पहले किसी भी बाहरी ऑक्सीजन का इस्तेमाल नहीं किया।

वह रास्ते पर अकेले ही दौड़ रहे थे, लेकिन उनके आगे एशियन ट्रेकिंग एजेंसी के शेरपा गाइड ऑक्सीजन सिलेंडर, पानी और खाने के साथ बैकअप के तौर पर तैनात थे।

कैंसर को मात देकर बने स्पीड किंग

6 साल की मासूम उम्र में टायलर को एप्लास्टिक एनीमिया का पता चला था। कीमोथेरेपी के कई दर्दनाक दौर से गुजरने के बाद उन्होंने इस बीमारी को हराया, एप्लास्टिक एनीमिया एक दुर्लभ प्रकार का ब्लड कैंसर है, जिसमें शरीर में पर्याप्त रक्त कोशिकाएं नहीं बनतीं।

कैंसर से जंग जीतने वाले टायलर आज दुनिया के सबसे बेहतरीन एंड्योरेंस एथलीटों में गिने जाते हैं। एवरेस्ट से पहले वे नेपाल में मनास्लू और अमा डबलाम, तंजानिया में किलिमंजारो, अर्जेंटीना में एकॉनकागुआ और इक्वाडोर में कोटोपैक्सी जैसी दुनिया की कई सबसे ऊंची चोटियों पर सबसे तेज चढ़ाई के रिकॉर्ड अपने नाम कर चुके हैं।

अभियान के लीडर दावा स्टीवन शेरपा ने गर्व से कहा कि उन्होंने सिर्फ 9 घंटे 55 मिनट में यह कारनामा कर दिखाया। हालांकि, इस रिकॉर्ड को अभी नेपाल के पर्यटन विभाग से आधिकारिक मंजूरी मिलना बाकी है। इसके लिए काठमांडू पहुंचने पर टायलर के GPS लॉग्स, शिखर की तस्वीरों और शेरपा गाइडों के बयानों की जांच की जाएगी,

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